1952 से कैसे बदला राष्ट्रपति चुनाव? पिछले दो दशकों से केंद्र v/s विपक्ष का रह गया मुकाबला

0
111
नई दिल्ली (संवाददाता)। राष्ट्रपति चुनाव की रेस में इस बार एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद और विपक्षी उम्मीदवार मीरा कुमार हैं, जिसे लेकर कहा जा रहा है कि रामनाथ कोविंद, मीरा कुमार को मात दे सकते हैं। इस चुनावी मैदान में कई बदलाव आए हैं, लेकिन सबसे अहम ये कि अब ये मुकाबला पिछले दो दशकों से केंद्र और विपक्ष के बीच रह गया है।। एक समय ऐसा भी था जब उम्मीदवारों के बीच होने वाला मुकाबला बेहद रोचक हुआ करता था। आइए आपको बताते हैं 1952 से इस मैदान में हो रही लड़ाई का दिलचस्प इतिहास….
2017 का ये मुकाबला 14वां राष्ट्रपति चुनाव है, इससे पहले चुनाव 1952, 1957, 1962, 1967, 1969, 1974, 1977, 1982, 1987, 1992, 1997, 2002, 2007 और 2012 में हो चुका है। 1952 के चुनाव में पांच उम्मीदवारों की बीच जद्दोजहद हुई, लेकिन ये आकंड़ा 1957 और 1962 में तीन उम्मीदवारों के बीच रह गया।

इस बीच 1967 के चुनाव में करीब 17 उम्मीदवार शामिल हुए। हालांकि, पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने करीब 1 लाख वोटों से के सुब्बाराव को मात दी, जबकि करीब 9 उम्मीदवारों को वोट ही नहीं मिले। दो उम्मीदवारों को 125 वोट और अन्य दो को 232 वोट पड़े। दूसरे और तीसरे नंबर पर आने वाले उम्मीदवारों को क्रमश: 1369 और 750 वोट मिले।जाकिर हुसैन की कार्यकाल में ही मौत हो जाने के बाद 1969 में फिर चुनाव हुए और इस बार रेस में 15 उम्मीदवार थे। चुनाव में हार जाने के बाद उम्मीदवार विरोध में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते थे। इतना ही नहीं राष्ट्रपति चुनाव के जरिए पब्लिसिटी पाने के लिए उम्मीदवार नियमों का हवाला देते थे और खबरों में बने रहते थे।

इस तरह की परेशानियों के उठने की वजह से तत्काल सरकार और विपक्ष ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव एक्ट 1952 में बदलाव करने का फैसला किया और इसमें संसोधन करते हुए 1974 एक्ट लाया गया। इस एक्ट के मुताबिक अब किसी भी उम्मीदवार के 10 सपोर्ट्स जो प्रपोजर्स और 10 सेकेंडर्स होने चाहिए। साथ ही करीब 2500 रुपये सिक्योरिटी जमा किए जाने का बदलाव आया। यह भी निर्देश दिए गए कि उम्मीदवार नामांकन भरने के ऐलान के बाद से 14 दिनों के अंदर पर्चा दाखिल कर सकते हैं।

इस संसोधन के बावजूद राष्ट्रपति चुनाव की रेस में उम्मीदवारों में कमी नहीं। ऐसा माना जाता है कि 1977 में  सबसे ज्यादा उम्मीदवार 37 इस रेस में शामिल हुए। ये चुनाव इसलिए ऐतिहासिक साबित हुआ था क्योंकि 36 का पर्चा रिजेक्ट कर दिया गया और नीलम संजीव रेड्डी बिना किसी विरोध के राष्ट्रपति चुने गए। इसके बाद पर्चे तो कई भरे जाते थे, लेकिन रेस सिर्फ दो नामों के बीच दिखने लगी।

LEAVE A REPLY